अधिवक्ता रजत कादयान एवं सहयोगी · गुरुग्राम

सितंबर 2026 के आख़िर में लवली प्रोफ़ेशनल यूनिवर्सिटी (एलपीयू), फगवाड़ा में हुई हिंसा पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के सामने सबसे ज़्यादा चर्चित साइबर अपराध मामलों में से एक बन गई है। सीबीआई जाँच की माँग वाली जनहित याचिका (PIL) अब एक बड़े सवाल पर पहुँच गई है: पंजाब पुलिस द्वारा IT Act की धारा 66F (साइबर आतंकवाद) जोड़े जाने के बाद क्या राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) को जाँच सौंपी जानी चाहिए?

इस लेख में बताया गया है कि अब तक क्या हुआ, हाई कोर्ट ने क्या आदेश दिए, और क़ानूनी रूप से इसका क्या अर्थ है।

मामला एक नज़र में

  • मामला: रवि राज बनाम भारत संघ एवं अन्य, CWP-PIL-279-2026
  • अदालत: पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट, मुख्य न्यायाधीश अश्वनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति रोहित कपूर की खंडपीठ
  • याचिकाकर्ता: एलपीयू का एक बी.टेक छात्र, जिसने हाई कोर्ट की निगरानी में सीबीआई जाँच की माँग की है
  • ताज़ा आदेश: 4 नवंबर 2026
  • अगली तारीख़: 17 नवंबर 2026

मामले की शुरुआत

26 सितंबर 2026 की रात एलपीयू के छात्रों के बीच एक असत्यापित पोस्ट फैलने लगी। याचिका के अनुसार यह पोस्ट रेडिट पर थी और इसमें दावा किया गया था कि कैंपस में एक छात्रा के साथ यौन उत्पीड़न हुआ और बाद में उसने आत्महत्या कर ली। यूनिवर्सिटी ने इन दावों को झूठा और निराधार बताया।

इस पोस्ट के बाद 26 और 27 सितंबर को विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गए। संपत्ति को नुकसान पहुँचाया गया और आग लगाई गई, और फगवाड़ा के पास राष्ट्रीय राजमार्ग 44 घंटों तक जाम रहा। कक्षाएँ दस दिनों के लिए स्थगित कर दी गईं और मध्य-सत्र परीक्षाएँ टाल दी गईं। पुलिस ने कथित यौन उत्पीड़न को लेकर अज्ञात व्यक्तियों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की, और हिंसा को लेकर अलग मामले दर्ज किए। कुछ ही दिनों में शुरुआती गिरफ़्तारियों की ख़बरें आईं।

अब तक पुलिस ने अदालत को बताया है कि पोस्ट में बताई गई घटना हुई ही नहीं। राज्य ने अदालत को यह भी बताया कि मूल पोस्ट 26 सितंबर को ही, यानी 27 सितंबर की हिंसा से पहले, हटा दी गई थी।

हाई कोर्ट की सुनवाइयों की समय-रेखा

29 सितंबर 2026: तत्काल सुनवाई के लिए उल्लेख

वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव चोपड़ा ने मुख्य न्यायाधीश की पीठ के सामने याचिका का उल्लेख किया और बताया कि कैंपस में दंगा, आगज़नी और लूटपाट हुई है। अदालत अगले दिन सुनवाई के लिए सहमत हो गई।

30 सितंबर 2026: स्थिति रिपोर्ट माँगी गई

राज्य ने कहा कि एफ़आईआर दर्ज कर ली गई हैं और जाँच चल रही है। अदालत केवल मौखिक आश्वासन से संतुष्ट नहीं हुई। उसने लिखित स्थिति रिपोर्ट माँगी, जिसमें की गई कार्रवाई, ज़िम्मेदार लोग, और यह बताना था कि सोशल मीडिया पोस्ट में बताई गई घटना वास्तव में हुई या नहीं।

12 अक्टूबर 2026: अदालत ने पुलिस जाँच में कमियाँ बताईं

स्थिति रिपोर्ट पढ़ने के बाद पीठ ने कहा कि जाँच उसकी अपेक्षाओं से काफ़ी कम है। उसने पुलिस से कहा कि वह इस बात के "व्यापक निहितार्थों" पर ध्यान दे कि सोशल मीडिया पर एक ऐसी घटना, जो हुई ही नहीं, बड़े पैमाने पर अशांति का कारण बन गई। अदालत ने:

  • किसी स्वतंत्र एजेंसी पर विचार करने से पहले राज्य पुलिस को एक और मौका दिया;
  • निर्देश दिया कि जाँच की निगरानी पंजाब पुलिस काउंटर-इंटेलिजेंस का एक वरिष्ठ अधिकारी करे; और
  • दर्ज किया कि राज्य गूगल सहित सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स को इस गैर-मौजूद घटना से जुड़ी पोस्ट हटाने के लिए लिखेगा।

4 नवंबर 2026: धारा 66F जोड़ी गई, एनआईए का रास्ता खुला

यह सबसे अहम घटनाक्रम है। पंजाब पुलिस की दूसरी स्थिति रिपोर्ट में कहा गया कि जाँच के दौरान IT Act की धारा 66F के तहत अपराध की ओर इशारा करने वाली सामग्री प्रथम दृष्टया सामने आई है, और यह धारा मामले में जोड़ दी गई।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि धारा 66F राष्ट्रीय जाँच एजेंसी अधिनियम, 2008 की अनुसूची में शामिल है, जिससे यह धारा 2(g) के तहत "अनुसूचित अपराध" बन जाती है। अनुसूचित अपराध दर्ज होने पर NIA Act की धारा 6 एक तय प्रक्रिया बताती है। अदालत ने कहा कि राज्य के हलफ़नामे से यह नहीं दिखता कि अधिकारियों ने NIA Act पर विचार किया है। अदालत ने निर्देश दिया:

  • राज्य NIA Act की धारा 6 के तहत अनुसूचित अपराध से जुड़ी अपनी रिपोर्ट 72 घंटों के भीतर केंद्र सरकार को भेजे; और
  • केंद्र रिपोर्ट मिलने के एक हफ़्ते के भीतर तय करे कि क्या एनआईए जाँच करेगी।

यह आदेश अपने आप जाँच स्थानांतरित नहीं करता। जब तक केंद्र मामला एनआईए को नहीं सौंपता, पंजाब पुलिस जाँच जारी रखेगी। आगे की स्थिति 17 नवंबर 2026 को अदालत के सामने रखी जानी है।

क़ानूनी रूप से इसका क्या अर्थ है

धारा 66F से सब कुछ क्यों बदल जाता है

धारा 66F, IT Act का सबसे गंभीर अपराध है। इसमें उम्रक़ैद तक की सज़ा है, यह गैर-ज़मानती है, और इसका ट्रायल सेशन कोर्ट में होता है। इसके तत्वों और ज़मानत की स्थिति को हमने अपने लेख आईटी एक्ट की धारा 66F: साइबर आतंकवाद और ज़मानत कैसे मिले में विस्तार से समझाया है।

66F जुड़ने से मामला NIA Act के दायरे में भी आ जाता है। इसीलिए अदालत में बहस "सीबीआई या राज्य पुलिस" से हटकर "क्या एनआईए को जाँच लेनी चाहिए" पर आ गई है।

NIA Act की धारा 6 की प्रक्रिया

  1. अनुसूचित अपराध दर्ज होने पर थाना प्रभारी को राज्य सरकार को रिपोर्ट भेजनी होती है।
  2. राज्य को इसे जल्द से जल्द केंद्र सरकार को भेजना होता है।
  3. केंद्र अपराध की गंभीरता और अन्य प्रासंगिक बातों के आधार पर तय करता है कि मामला एनआईए को जाए या नहीं। क़ानून 15 दिनों के भीतर निर्णय की बात करता है।
  4. अगर केंद्र एनआईए जाँच का निर्देश देता है, तो राज्य पुलिस को अपनी जाँच रोककर रिकॉर्ड एनआईए को सौंपने होते हैं।

हाई कोर्ट ने इस प्रक्रिया को खुला छोड़ने के बजाय एक समय-सीमा में बाँध दिया है।

खुला क़ानूनी सवाल: क्या झूठी पोस्ट "साइबर आतंकवाद" है?

पुलिस ने सार्वजनिक रूप से नहीं बताया है कि किस सामग्री के आधार पर धारा 66F लगाई गई, इसलिए विशिष्ट तथ्यों पर टिप्पणी करना अभी जल्दबाज़ी होगी। लेकिन क़ानून के सामान्य सिद्धांत के रूप में धारा 66F का दायरा सीमित है। धारा 66F(1)(A) के लिए भारत की एकता, अखंडता, सुरक्षा या संप्रभुता को ख़तरे में डालने, या लोगों में आतंक फैलाने का इरादा ज़रूरी है, और यह विशेष तरीकों से होना चाहिए: अधिकृत पहुँच से रोकना, कंप्यूटर संसाधन तक अनधिकृत पहुँच, या कंप्यूटर संदूषक डालना। इसके साथ मृत्यु, चोट, संपत्ति का विनाश या आवश्यक सेवाओं में बाधा जैसा गंभीर परिणाम भी ज़रूरी है। धारा 66F(1)(B) प्रतिबंधित जानकारी तक अनधिकृत पहुँच से जुड़ी है।

ऑनलाइन झूठी अफ़वाह फैलाना गंभीर मामला है। इस पर BNS के तहत शत्रुता को बढ़ावा देने या सार्वजनिक उपद्रव से जुड़े बयानों जैसे अपराध लग सकते हैं। यह साइबर आतंकवाद भी है या नहीं, यह इस पर निर्भर करेगा कि जाँच में धारा 66F के लिए ज़रूरी विशेष इरादा और विशेष तरीके सामने आते हैं या नहीं। यह सवाल एनआईए के फ़ैसले और आगे चलकर आरोपी बनाए जाने वाले किसी भी व्यक्ति, दोनों के लिए बहुत अहम होगा।

व्यापक सबक: ग़लत सूचना क़ानून-व्यवस्था के लिए ख़तरा

अंतिम नतीजा जो भी हो, यह मामला दिखाता है कि एक असत्यापित पोस्ट कुछ ही घंटों में बड़े पैमाने पर अशांति का कारण बन सकती है। हाई कोर्ट ने पुलिस से इन "व्यापक निहितार्थों" पर ध्यान देने को कहा है, जिसमें यह भी शामिल है कि पोस्ट कैसे बनाई और फैलाई गई, और प्लेटफ़ॉर्म हटाने के अनुरोधों पर कैसे प्रतिक्रिया देते हैं। भविष्य में प्लेटफ़ॉर्म की जवाबदेही और फ़ेक न्यूज़ से जुड़े आपराधिक क़ानून पर बहस में इस मामले का हवाला दिए जाने की संभावना है।

17 नवंबर 2026 को किन बातों पर नज़र रहेगी

  • क्या राज्य ने 72 घंटों के भीतर केंद्र को रिपोर्ट भेजी।
  • क्या केंद्र ने मामला एनआईए को सौंपने का फ़ैसला किया।
  • अगर नहीं, तो क्या अदालत अपनी निगरानी में सीबीआई जाँच की मूल माँग पर फिर से विचार करती है।
  • धारा 66F लगाने के आधार पर कोई और जानकारी।

अगली सुनवाई के बाद हम इस लेख को अपडेट करेंगे।

साइबर अपराध या IT Act के मामले में सलाह चाहिए?

रजत कादयान एंड एसोसिएट्स ज़िला एवं सत्र न्यायालय, गुरुग्राम और पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में साइबर अपराध और ज़मानत के मामलों में सलाह देते हैं।

फ़ोन: +91 82954 13475 · ईमेल: contact@rajatkadyan.com

यह लेख 8 नवंबर 2026 तक की सार्वजनिक रूप से रिपोर्ट की गई अदालती कार्यवाही पर आधारित है। याचिका के आरोप और जाँच अभी परखे नहीं गए हैं। रजत कादयान एंड एसोसिएट्स इस मामले से जुड़े नहीं हैं। यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है और क़ानूनी सलाह नहीं है।

क्या आप स्वयं ऐसी स्थिति में हैं?

+91 82954 13475 पर कॉल करें या अपने मामले का विवरण भेजें। पहला परामर्श निःशुल्क है। यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है और किसी विशेष मामले पर विधिक सलाह नहीं है।

आगे पढ़ें

निःशुल्क परामर्श · 24×7

एफ़आईआर के बाद हर घंटा मायने रखता है।

कॉल व्हाट्सऐप निःशुल्क समीक्षा