अधिवक्ता रजत कादयान एवं सहयोगी · गुरुग्राम

अगर किसी एफ़आईआर में आपका नाम सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act) की धारा 66F के तहत है, तो साइबर क़ानून में इससे गंभीर स्थिति शायद ही कोई हो। धारा 66F साइबर आतंकवाद से जुड़ी है। इसमें उम्रक़ैद तक की सज़ा हो सकती है, और यह गैर-ज़मानती और संज्ञेय अपराध है। IT Act के ज़्यादातर अपराधों में थाने से ही ज़मानत मिल जाती है, लेकिन इसमें नहीं।

साथ ही, धारा 66F साइबर अपराध की एफ़आईआर में सबसे ज़्यादा गलत तरीके से लगाई जाने वाली धाराओं में से एक है। कई बार इसे सामान्य हैकिंग, डेटा चोरी या सोशल मीडिया के मामलों में बिना यह देखे जोड़ दिया जाता है कि धारा असल में क्या माँगती है। ज़मानत की ओर पहला कदम यही समझना है।

धारा 66F क्या कहती है

धारा 66F दो तरह के आचरण को दंडित करती है।

1. देश को ख़तरे में डालने वाले हमले – धारा 66F(1)(A). कोई व्यक्ति साइबर आतंकवाद करता है अगर वह भारत की एकता, अखंडता, सुरक्षा या संप्रभुता को ख़तरे में डालने, या लोगों में आतंक फैलाने के इरादे से:

  • किसी अधिकृत व्यक्ति को कंप्यूटर संसाधन तक पहुँच से रोकता है;
  • बिना अनुमति कंप्यूटर संसाधन में घुसता है या उसे मिली अनुमति से आगे जाता है; या
  • वायरस या कोई अन्य कंप्यूटर संदूषक (contaminant) डालता है,

और इस आचरण से मृत्यु या चोट, संपत्ति को नुकसान, आवश्यक आपूर्ति या सेवाओं में बाधा, या धारा 70 के तहत अधिसूचित महत्वपूर्ण सूचना अवसंरचना (critical information infrastructure) को नुकसान होता है या होने की संभावना है।

2. प्रतिबंधित जानकारी तक पहुँच – धारा 66F(1)(B). यह अपराध तब भी बनता है जब कोई जानबूझकर बिना अनुमति कंप्यूटर संसाधन तक पहुँचता है और ऐसी जानकारी हासिल करता है जो राज्य की सुरक्षा या विदेशी संबंधों के कारण प्रतिबंधित है (या अन्य प्रतिबंधित जानकारी), यह मानने के कारण के साथ कि इसका इस्तेमाल भारत की संप्रभुता, सुरक्षा, मित्र देशों से संबंध, लोक व्यवस्था आदि को नुकसान पहुँचाने, या किसी विदेशी राष्ट्र या समूह को लाभ पहुँचाने में हो सकता है।

सज़ा – धारा 66F(2): कारावास, जो उम्रक़ैद तक हो सकता है।

66F को इतना गंभीर क्यों माना जाता है

  • गैर-ज़मानती: IT Act की धारा 77B के तहत केवल तीन साल तक की सज़ा वाले अपराध ज़मानती हैं। 66F इससे कहीं ऊपर है। जुलाई 2026 में महाराज सरन बनाम पंजाब राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 77B के कारण धारा 66 ज़मानती है। धारा 66F को यह लाभ नहीं मिलता।
  • सेशन ट्रायल: उम्रक़ैद की सज़ा होने के कारण मुक़दमा मजिस्ट्रेट नहीं, सेशन कोर्ट में चलता है।
  • अक्सर UAPA या BNS के साथ: जाँच एजेंसियाँ गैरक़ानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA), या BNS की धारा 113 (आतंकवादी कृत्य) या धारा 111 (संगठित अपराध) भी जोड़ सकती हैं। इससे ज़मानत और कठिन हो जाती है।
  • चार्जशीट से पहले लंबी हिरासत: उम्रक़ैद वाले अपराधों में पुलिस को BNSS की धारा 187(3) के तहत डिफ़ॉल्ट ज़मानत से पहले चार्जशीट दाख़िल करने के लिए 60 नहीं, 90 दिन मिलते हैं। UAPA में यह अवधि 180 दिन तक बढ़ाई जा सकती है।

मुख्य बात: कई "66F" मामले असल में साइबर आतंकवाद नहीं होते

धारा 66F के लिए दो बातें ज़रूरी हैं, जो कई एफ़आईआर में नहीं होतीं:

  1. आतंकवादी इरादा: भारत की एकता, अखंडता, सुरक्षा या संप्रभुता को ख़तरे में डालने, या लोगों में आतंक फैलाने का इरादा। निजी बदला, वित्तीय धोखाधड़ी, कारोबारी विवाद, पीछा करना, मानहानि, या पुराने नियोक्ता का सर्वर हैक करना — इनमें यह इरादा नहीं होता।
  2. गंभीर परिणाम या प्रतिबंधित लक्ष्य: मृत्यु, चोट, विनाश, आवश्यक सेवाओं में बाधा, अधिसूचित महत्वपूर्ण सूचना अवसंरचना को नुकसान, या ऐसी जानकारी तक पहुँच जो वास्तव में राज्य की सुरक्षा के कारण प्रतिबंधित हो।

अगर एफ़आईआर में ये दोनों बातें नहीं दिखतीं, तो 66F का आरोप कमज़ोर है। अदालतों ने ऐसे मामलों में अग्रिम ज़मानत दी है जहाँ रिकॉर्ड में राष्ट्रीय सुरक्षा को कोई ख़तरा नहीं दिखा और 66F का अपराध नहीं बना। 66F हटने पर आम तौर पर धारा 66, 66C या 66D जैसे अपराध बचते हैं, जो ज़मानती हैं या जिनमें सज़ा बहुत कम है।

धारा 66F के मामले में ज़मानत कैसे माँगी जाती है

कदम 1: एफ़आईआर लें और धाराएँ जाँचें

तुरंत एफ़आईआर की प्रति लें। देखें कि ठीक-ठीक कौन से तथ्य आरोपित हैं, और क्या 66F उन तथ्यों से बनती है या बस जोड़ दी गई है। UAPA, BNS 111 या BNS 113 भी देखें, क्योंकि हर एक से ज़मानत की रणनीति बदलती है।

कदम 2: जल्दी अग्रिम ज़मानत के लिए आवेदन करें (धारा 482 BNSS)

अगर गिरफ़्तारी नहीं हुई है, तो धारा 482 BNSS के तहत अग्रिम ज़मानत के लिए सेशन कोर्ट या हाई कोर्ट में जाया जा सकता है। मुख्य दलीलें:

  • 66F के तत्व नहीं बनते: देश को ख़तरे में डालने या आतंक फैलाने का इरादा नहीं, और कोई गंभीर परिणाम या प्रतिबंधित जानकारी नहीं।
  • सबूत डिजिटल हैं और पहले से पुलिस के पास हैं: डिवाइस, लॉग और सर्वर डेटा ज़ब्त हैं या फ़ॉरेंसिक लैब में हैं, इसलिए कुछ बरामद करने के लिए हिरासत की ज़रूरत नहीं।
  • सहयोग की तैयारी: जाँच में शामिल होना और निर्देशानुसार डिवाइस पेश करना।
  • साफ़ रिकॉर्ड और समाज में जड़ें: कोई पिछला मामला नहीं, स्थायी घर, नौकरी या कारोबार, और पारिवारिक संबंध।

ध्यान दें: अगर UAPA भी लगाया गया है, तो UAPA की धारा 43D(4) अग्रिम ज़मानत पर रोक लगाती है। तब ध्यान नियमित ज़मानत और UAPA के आरोप को चुनौती देने पर जाता है।

कदम 3: गिरफ़्तारी के बाद नियमित ज़मानत (धारा 480 और 483 BNSS)

चूँकि 66F में उम्रक़ैद की सज़ा है, इसलिए जहाँ आरोपी के दोषी होने के उचित आधार हों, वहाँ मजिस्ट्रेट आम तौर पर ज़मानत नहीं दे सकता (धारा 480 BNSS)। कुछ सीमित अपवाद हैं, जैसे महिला, 16 साल से कम उम्र का व्यक्ति, या बीमार या अशक्त व्यक्ति। व्यवहार में नियमित ज़मानत धारा 483 BNSS के तहत सेशन कोर्ट से, और वहाँ से इनकार होने पर हाई कोर्ट से माँगी जाती है।

नियमित ज़मानत के लिए आम तौर पर दी जाने वाली दलीलें:

  • प्रथम दृष्टया 66F का मामला नहीं (ऊपर वाली तत्वों की दलील)।
  • चार्जशीट दाख़िल हो चुकी है या जाँच पूरी है, इसलिए हिरासत का कोई उद्देश्य नहीं।
  • लंबी हिरासत और धीमा ट्रायल। ज़मानत नियम है और जेल अपवाद (सतेंदर कुमार अंतिल बनाम सीबीआई, 2022)। UAPA में भी सुप्रीम कोर्ट ने भारत संघ बनाम के.ए. नजीब (2021) में कहा कि ट्रायल की कोई संभावना न होने पर लंबी हिरासत अनुच्छेद 21 के तहत ज़मानत का आधार हो सकती है।
  • समानता (parity): जिन सह-आरोपियों को ज़मानत मिल चुकी है, उनके बराबर।

कदम 4: डिफ़ॉल्ट ज़मानत की समय-सीमा पर नज़र रखें

अगर पुलिस गिरफ़्तारी के 90 दिनों के भीतर (या UAPA में बढ़ाई गई अवधि में) चार्जशीट दाख़िल नहीं करती, तो आरोपी को धारा 187(3) BNSS के तहत डिफ़ॉल्ट ज़मानत का अटल अधिकार मिल जाता है। आवेदन चार्जशीट आने से पहले दाख़िल होना चाहिए, इसलिए तारीख़ों पर सावधानी से नज़र रखनी ज़रूरी है।

कदम 5: ज़मानत की संभावित शर्तें

अदालतें आम तौर पर ऐसी शर्तें लगाती हैं: पासपोर्ट जमा करना, बुलाए जाने पर जाँच में शामिल होना, गवाहों या शिकायतकर्ता से संपर्क न करना, डिजिटल सबूतों से छेड़छाड़ न करना, और कभी-कभी कुछ खातों या डिवाइस का इस्तेमाल न करना।

66F में नाम आने पर क्या न करें

  • डेटा डिलीट न करें, फ़ोन वाइप न करें, या खाते बंद न करें। सबूत नष्ट करना अलग अपराध है और ज़मानत आवेदन को गंभीर नुकसान पहुँचाता है।
  • शिकायतकर्ता या गवाह के रूप में नामित किसी व्यक्ति से संपर्क न करें।
  • सोशल मीडिया पर मामले के बारे में पोस्ट न करें।
  • बिना क़ानूनी सलाह के पुलिस के सामने पेश न हों। कोई बयान देने या डिवाइस सौंपने से पहले वकील से बात करें।

गुरुग्राम में धारा 66F के मामलों में क़ानूनी सहायता

धारा 66F के मामले में तेज़ कार्रवाई और सावधानीपूर्वक तकनीकी व क़ानूनी विश्लेषण की ज़रूरत होती है। रजत कादयान एंड एसोसिएट्स ज़िला एवं सत्र न्यायालय, गुरुग्राम और पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में साइबर अपराध और ज़मानत के मामले देखते हैं। जहाँ एफ़आईआर दर्ज ही नहीं होनी चाहिए थी, वहाँ धारा 528 BNSS के तहत एफ़आईआर रद्द करवाने का रास्ता भी उपलब्ध हो सकता है।

फ़ोन: +91 82954 13475 · ईमेल: contact@rajatkadyan.com
चैंबर नंबर 169A, भगत सिंह ब्लॉक, ज़िला न्यायालय, गुरुग्राम

अस्वीकरण: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है और क़ानूनी सलाह नहीं है। हर मामला अपने तथ्यों पर निर्भर करता है। अपनी स्थिति के बारे में किसी वकील से सलाह लें।

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